आदिवासी एकता परिषद द्वारा आयोजित 32वें आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन
का आयोजन धुले जिले के पानखेड़ा गांव में बड़े उत्साह के साथ किया गया। आयोजन स्थल
पर 300 से अधिक स्टॉल लगाए गए थे। मेरे लिए, पिरामल फाउंडेशन के
अनामय ट्राइबल हेल्थ कोलैबोरेटिव का स्टॉल सबसे अधिक महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक था।
आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन आदिवासी संस्कृति, परंपरा और ज्ञान का उत्सव है। आयोजक इस सम्मेलन में
विभिन्न स्टालों के माध्यम से जनजातीय जीवन शैली, कला, खाद्य संस्कृति और
पारंपरिक ज्ञान को प्रदर्शित करने का प्रयास करते हैं। इस वर्ष विभिन्न राज्यों के
जनजातीय सांस्कृतिक मूल्यों को प्रदर्शित करने वाले स्टॉल लगाए गए , जहां पिरामल फाउंडेशन का स्टॉल मेरे लिए सबसे अलग था।
मुझे लगता है कि यह केवल प्रदर्शनी तक ही सीमित नहीं था, बल्कि यह समाज को जागरूक करने, जनजातीय ज्ञान , प्रकृति से जुड़ी हुई परंपराओं और समावेशी जीवन शैली को केंद्र में रखते हुए
उस पर व्यापक बौद्धिक चर्चा करने का एक
अच्छा प्रयास था।
पिरामल फाउंडेशन का मुख्य उद्देश्य इस बात पर प्रकाश डालना था कि पारंपरिक
आदिवासी उपचार पदद्थि के अनुभव और ज्ञान का उपयोग आधुनिक समाज के स्वास्थ्य और
पारिस्थितिकी तंत्र में कैसे किया जा सकता है। पिरामल फाउंडेशन मुख्य उद्देश्य
आदिवासी समुदाय के ज्ञान को संरक्षित करने और अगली पीढ़ी के लिए सहेजने की हैं
क्योंकि बदलते समय ने इस सदियों पुराने परंपरागत ज्ञान ओर अनुभव को नष्ट करने का
खतरा पैदा कर दिया है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस महासम्मेलन में पिरामल फाउंडेशन से शोभा
जी ,मंदार जी , असलम शेख़ , नीलिमा, गुंजल ,सदान तथा
गांधी फ़ेलो सुधांशु कुमार , और झूमा के साथ ही अन्य राज्यों के तीन गांधी फैलो ने
सक्रिय सहभागिता करते हुए अनामय कार्यक्रम के बारे में बहुत ही स्पष्टता और
विस्तृत रूप से जानकारी प्रदान कर रहे थे।
जब मैं कार्यक्रम में सम्मेलन के हर
स्टाल पर जाकर नई जानकारी सीखने की कोशिश कर रहा था, तो पिरामल फाउंडेशन के स्टाल पर गांधी
फ़ेलो सुधांशु कुमार ने मुझे बहुत ही
सारगर्भित और तार्किक तरीके से अनामय कार्यक्रम के प्रत्येक
बिंदु की गहराई से व्याख्या की ।
उन्होंने न केवल जानकारी दी बल्कि विचार-विमर्श करके पर्यावरण और स्वास्थ्य के
बारे में भी विस्तृत जानकारी दी।
इस स्टाल का एक और महत्व यह है कि स्टाल पर लगे पोस्टर इस स्टाल की आत्मा हैं।
यह सिर्फ जानकारीपूर्ण ही नहीं थे बल्कि यह विचार-प्रेरक भी थे।
मैं स्टाल के सभी पोस्टरों की तस्वीरें लेने के लिए उत्सुक था क्योंकि
प्रत्येक पोस्टर वास्तव में संदेश पूर्ण
था।
पोस्टर इस प्रकार हैंः
1. जलवायु परिवर्तन की समस्या का समाधान क्यो आवश्यक हैः
जनजातीय जीवन शैली प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन उन्हें
अधिक गंभीर रूप से प्रभावित करता है। इस संदर्भ में जलवायु संरक्षण के महत्व पर
प्रकाश डाला गया।
2. जंगल से जुडी उपचार की कडी:
यह दिखाया गया कि कैसे पौधे और औषधीय ज्ञान में आदिवासी समुदाय का अनुभव स्वास्थ्य क्षेत्र में उपयोगी हो सकता है।
3. शरीर की देखभाल:
स्वास्थ्य पर पारंपरिक आहार और जीवन शैली के सकारात्मक प्रभाव पर प्रकाश डाला गया।
4. हमारी पृथ्वी, हमारा कर्तव्य:
उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के विकास की आवश्यकता पर बल दिया।
5. बदलते मौसम, बदलती जिंदगीया:
जलवायु परिवर्तन न केवल पर्यावरण को बल्कि मानव स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहा है।
6. औषधीय जडी-बुटीयों का सहारा जलवायू परिवर्तन से हो रहा किनारा:
पारिस्थितिकीय असंतुलन के कारण औषधीय पौधों का क्षरण कैसे हो रहा है, इसके बारे में जागरूकता पैदा की।
7. स्वास्थ्य में संस्कृती की आवाज:
आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली में जनजातीय ज्ञान का उपयोग कैसे किया जा सकता है, इस पर चर्चा की गई।
4. परंपरागत चिकित्सको को आय उपार्जन के अवसर उपलब्ध करानाः
पिरामल फ़ाउंडेशन ने अनामय कार्यक्रम
के माध्यम से वनौषधियों से समुदाय को त्वरित उपचार प्रदान करने वाले परंपरागत वैद्यों/ चिकित्सको को मुख्य धारा में लाने के लिए, उनके अनुभवों ओर ज्ञान से अधिक से अधिक लोग लाभान्वित
हो इस उद्देश्य से महासम्मेलन में मध्यप्रदेश ओर महाराष्ट्र के जनजातीय समुदाय के
चुने हुए अनुभवी और सर्टिफाइड चिकित्सकों को स्थान उपलब्ध कराया ताकी वह अपने
ज्ञान ओर अनुभव का प्रसार करते हुए जनसमुदाय को प्राकृतिक पद्धति से सामान्य
बीमारियों का उपचार दे सके और इसके माध्यम से उनकी आय उपार्जन में सहयोग हो सके, ताकी उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो सकें।
सुधांशु, यश और झूमा से बात करने
के बाद, मुझे निम्नलिखित बिंदुओं
को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिली।
5. पारंपरिक ज्ञान का विकासः
जनजातीय समुदाय का पारंपरिक ज्ञान विलुप्त होने के कगार पर है। जलवायु परिवर्तन, औद्योगीकरण और वनों की कटाई ने उनका जीवन कठिन बना
दिया है। पिरामल फ़ाउंडेशन के अनामय जैसे
कार्यक्रम इस ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने और इसे नई पीढ़ियों के लिए
संरक्षित करने का प्रयास कर रहा है।
6.पर्यावरणीय स्थायित्वः
लोगों की जीवन शैली प्रकृति के अनुरूप है। उनके तरीकों का अध्ययन करके और
उन्हें आधुनिक समाज में शामिल करके, जलवायु संकट से निपटने के लिए समाधान खोजे जा सकते हैं।
7.स्थानीय समुदायों का विकासः
पिरामल फ़ाउंडेशन के अनामय
कार्यक्र्म ने परंपरागत वैद्यों/ चिकित्सकों को स्थान ओर अवसर उपलब्ध
कराये ताकी वह अपने ज्ञान ओर अनुभव का प्रसार करते हुए जनसमुदाय को प्राकृतिक
पद्धति से सामान्य बीमारियों का उपचार दे सके इस तरह की गतिविधियाँ आदिवासी समुदाय
को आर्थिक सहायता प्रदान करती हैं।
8.स्वास्थ्य और चिकित्सा के क्षेत्र में नई दिशाएँः
जनजातीय ज्ञान पर आधारित औषधीय पौधों
के माध्यम से उपचार का अध्ययन
आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली में किफायती, सुलभ और टिकाऊ समाधान प्रदान कर सकता है।
9.सामुदायिक-वन संबंधों को मजबूत बनानाः
आदिवासियों का जंगल के साथ जो मजबूत बंधन है, उसे दूसरों को सिखाना आवश्यक है। प्रकृति का सम्मान करना महत्वपूर्ण है।
पिरामल फाउंडेशन का अनामय का स्टॉल
केवल ज्ञान का आदान-प्रदान नहीं था, यह पर्यावरण, स्वास्थ्य और संस्कृति
पर एक प्रतिबिंब था। जलवायु संकट के आज के युग में इस तरह की पहलों की अधिक
आवश्यकता है। आधुनिक समस्याओं का समाधान खोजने के लिए पारंपरिक ज्ञान का उपयोग
करने का अनामय कार्यक्रम का प्रयास
सराहनीय है।
पिरामल फाउंडेशन ने सम्मेलन में अपने स्टॉल के माध्यम से आदिवासी जीवन शैली और
ज्ञान के महत्व को रेखांकित किया है ,उनके प्रयासों से जनजातीय समाज की विशेषताएं और उनकी समस्याएं सभी तक पहुंचीं
हैं। जनजातीय समुदाय के परंपरागत ज्ञान को संरक्षित करना, इस ज्ञान के माध्यम से समाज को त्वरित सेवा प्रदान
करने वाले लोगों की पहचान स्थापित करना, जल, जंगल ओर ज़मीन के
अंधाधुंध दोहन को रोकते हुए पर्यावरण का संरक्षण करना और इस तरह की सौदेश्यपूर्ण
पहलों को लागू करके समाज को सतत विकास के रास्ते पर ले जाना वर्तमान समय की महती
आवश्यकता है ।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------
धुळे जिल्ह्यातील पानखेडा गावात मोठ्या उत्साहाने आयोजित करण्यात आलेल्या 32व्या आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासंमेलनाचा अनुभव खूपच विशेष होता. या संमेलनात 300 हून अधिक स्टॉल्स उभारले गेले होते. त्यापैकी पिरामल फाउंडेशनच्या अनामय ट्रायबल हेल्थ कोलॅबोरेटिव्ह चा स्टॉल मला अत्यंत महत्त्वाचा आणि ज्ञानवर्धक वाटला.
आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासंमेलन हे आदिवासी संस्कृती, परंपरा आणि ज्ञानाचा उत्सव आहे. या संमेलनाच्या माध्यमातून विविध स्टॉल्सद्वारे आदिवासी जीवनशैली, कला, खाद्यसंस्कृती आणि पारंपरिक ज्ञान लोकांपर्यंत पोहोचवण्याचा प्रयत्न आयोजकांनी केला आहे. यावर्षी अनेक राज्यांतील आदिवासी सांस्कृतिक मूल्ये आणि जीवनशैली दर्शवणारे स्टॉल्स उभारण्यात आले होते. यामध्ये पिरामल फाउंडेशनचा स्टॉल खूप वेगळा आणि प्रेरणादायक ठरला.
हा स्टॉल केवळ माहिती देणारा नव्हता, तर समाजात जनजागृती निर्माण करणारा, आदिवासी ज्ञान आणि निसर्गाशी जोडलेल्या परंपरांचे महत्त्व अधोरेखित करणारा होता. पिरामल फाउंडेशनने यामध्ये आदिवासींच्या पारंपरिक औषधोपचार पद्धतींच्या ज्ञानाचा आधुनिक आरोग्य व पर्यावरण व्यवस्थेसाठी कसा उपयोग होऊ शकतो यावर प्रकाश टाकला. तसेच, बदलत्या काळात या पारंपरिक ज्ञानाचा नाश होण्याचा धोका असल्याने त्याचे संरक्षण करणे आणि पुढच्या पिढ्यांसाठी त्याचा वारसा जतन करणे हा त्यांच्या प्रयत्नांचा मुख्य हेतू होता.
यामध्ये विशेष म्हणजे शोभा, मंदार, असलम शेख, निलिमा, गुंजल, सदान, गांधी फेलो सुधांशु कुमार, झूमा, तसेच इतर राज्यांतील तीन गांधी फेलोज यांनी सक्रिय सहभाग घेतला. त्यांनी अनामय कार्यक्रम विषयी अत्यंत स्पष्ट आणि सविस्तर माहिती दिली.
मी प्रत्येक स्टॉलवर भेट देत होतो, तेव्हा गांधी फेलो सुधांशु कुमार यांनी मला अनामय कार्यक्रमाच्या प्रत्येक पैलूची सखोल व्याख्या समजावून सांगितली. त्यांनी केवळ माहिती दिलीच नाही, तर पर्यावरण आणि आरोग्यासंदर्भात माझ्यासोबत विचारमंथनही केले.
या स्टॉलवरील पोस्टर्स हा देखील एक महत्त्वाचा भाग होता. हे केवळ माहितीपूर्णच नव्हते, तर विचारप्रवर्तक देखील होते. प्रत्येक पोस्टर महत्त्वपूर्ण संदेश देत होते.
पोस्टर्सवरील काही महत्त्वाचे विषयः
1. जैवविविधता आणि जलवायू बदल:
आदिवासी जीवनशैली निसर्गसंपत्तीवर अवलंबून आहे, त्यामुळे जलवायू बदलांचा त्यांच्यावर गंभीर परिणाम होतो. त्यामुळे निसर्ग संवर्धनाचे महत्त्व अधोरेखित केले गेले.
2. वनौषधींच्या उपचारपद्धती:
औषधी वनस्पती आणि आदिवासींच्या ज्ञानाचा आधुनिक आरोग्यव्यवस्थेत कसा उपयोग करता येईल हे दर्शवले गेले.
3. परंपरागत आहार व जीवनशैलीचे महत्त्व:
शरीरसंपदा राखण्यासाठी आदिवासींच्या पारंपरिक आहारपद्धतींचा उपयोग कसा होतो यावर भर दिला गेला.
4. आपली जमीन, आपले कर्तव्य:
नैसर्गिक साधनसंपत्तीच्या संवर्धनाची आवश्यकता यावर चर्चा केली गेली.
5. जलवायू बदलामुळे औषधी वनस्पतींवर होणारे परिणाम:
पर्यावरणीय असमतोलामुळे औषधी वनस्पतींच्या नष्ट होण्याच्या समस्येवर जागरूकता निर्माण केली.
6. परंपरागत वैद्यांना प्रोत्साहन:
या उपक्रमाद्वारे पिरामल फाउंडेशनने अनुभवी आदिवासी वैद्यांना मंच उपलब्ध करून दिला, ज्यामुळे त्यांचे ज्ञान लोकांपर्यंत पोहोचले आणि त्यांच्या उपजीविकेच्या संधी वाढल्या.
सुधांशु, यश, झूमा यांच्याशी संवाद साधल्यानंतर मला काही महत्त्वाचे मुद्दे अधिक स्पष्टपणे समजले:
पारंपरिक ज्ञानाचा विकास आणि संरक्षण: बदलत्या काळामुळे आदिवासी ज्ञान नष्ट होण्याच्या मार्गावर आहे. त्यामुळे त्याचे दस्तऐवजीकरण व संरक्षण अत्यावश्यक आहे.
पर्यावरणीय शाश्वतता:
आदिवासींच्या निसर्गाशी सुसंगत जीवनशैलीकडून आधुनिक समाजाला खूप काही शिकता येते.
आरोग्य आणि औषधीय वनस्पतींचा उपयोग: पारंपरिक औषधीय ज्ञान आधुनिक आरोग्य व्यवस्थेसाठी किफायतशीर आणि शाश्वत उपाय प्रदान करू शकते.
आर्थिक संधी:
परंपरागत वैद्यांना मुख्य प्रवाहात आणून त्यांची आर्थिक स्थिती सुधारण्याचे काम अनामय कार्यक्रम करत आहे.
पिरामल फाउंडेशनचा अनामय कार्यक्रम आणि त्यांचा स्टॉल हे केवळ ज्ञान देणारे नव्हते, तर समाजाला पर्यावरण, आरोग्य आणि संस्कृतीबद्दल आत्मचिंतन करण्यास प्रवृत्त करणारे होते. या प्रकारच्या उपक्रमांची आजच्या काळात नितांत आवश्यकता आहे. आदिवासी ज्ञानाचा उपयोग करून आधुनिक समस्या सोडवण्याचे त्यांचे प्रयत्न खरोखरच प्रेरणादायक आहेत.
- Raajoo Thokal, Pune, Maharashtra
9890151513




0 comments :
Post a Comment